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निमहा में secl की खाली कुर्सियों के बीच संपन्न हुई पर्यावरण जनसुनवाई,ग्रामीणों की गैरमौजूदगी ने खड़े किए कई सवाल

अनूपपुर/हिमांशू पासी - जमुना-कोतमा क्षेत्र अंतर्गत प्रस्तावित आमाडांड ओपन कास्ट विस्तार परियोजना को लेकर आज निमहा में आयोजित पर्यावरण जनसुनवाई की प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई है। जनसुनवाई के दौरान क्षेत्र में हुई भारी बारिश का असर साफ दिखाई दिया। खराब मौसम और क्षेत्र की बदहाल सड़कों के कारण बड़ी संख्या में ग्रामीण एवं संभावित प्रभावित लोग जनसुनवाई स्थल तक नहीं पहुंच सके। नतीजा यह रहा कि जिस जनसुनवाई का उद्देश्य परियोजना से प्रभावित होने वाले लोगों की राय, आपत्तियां और सुझाव सुनना था, वहां कई कुर्सियां खाली दिखाई दीं।

भारी बारिश बनी ग्रामीणों के लिए बड़ी बाधा-

क्षेत्र में लगातार हो रही बारिश के कारण ग्रामीण इलाकों से आवागमन प्रभावित रहा। कई मार्ग पहले से ही खराब स्थिति में हैं और बारिश के दौरान इन रास्तों की हालत और अधिक खराब हो जाती है। ऐसे में दूरदराज के गांवों से प्रभावित ग्रामीणों का जनसुनवाई स्थल तक पहुंचना मुश्किल रहा,स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी परियोजना को लेकर पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों पर जनता की राय लेना जरूरी है, तो ऐसी जनसुनवाई के लिए स्थानीय परिस्थितियों, मौसम और ग्रामीणों की वास्तविक पहुंच को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

ग्रामीणों का सवाल है कि जब बड़ी संख्या में प्रभावित लोग जनसुनवाई में पहुंच ही नहीं पाए, तो उनकी वास्तविक समस्याएं और आपत्तियां प्रशासन एवं परियोजना प्रबंधन के सामने किस तरह दर्ज हुईं?

जनप्रतिनिधियों की गैरमौजूदगी भी बनी चर्चा का विषय-

जनसुनवाई में ग्रामीणों के साथ-साथ क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की अपेक्षित मौजूदगी नहीं दिखाई देने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर परियोजना से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर जनप्रतिनिधियों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है, लेकिन खराब मौसम के बीच उनकी अनुपस्थिति ने पूरी प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए।

जनसुनवाई स्थल पर मौजूद लोगों के बीच भी यह चर्चा रही कि यदि क्षेत्र की जनता और उसके प्रतिनिधि ही पर्याप्त संख्या में उपस्थित नहीं हैं, तो परियोजना के वास्तविक प्रभावों को लेकर व्यापक जनमत कैसे सामने आएगा?

खाली कुर्सियां बयां कर रही थीं जमीनी हकीकत-

जनसुनवाई स्थल की तस्वीरें और वहां का माहौल कई सवाल अपने आप खड़े करता नजर आया। लोगों की अपेक्षित संख्या नहीं पहुंचने के कारण कई कुर्सियां खाली रहीं।एक तरफ परियोजना विस्तार को लेकर पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की कवायद है, वहीं दूसरी तरफ प्रभावित क्षेत्र की जनता की सीमित भागीदारी इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती है।

स्वास्थ्य, सड़क और शिक्षा के मुद्दे कहां गए?

आमाडांड ओपन कास्ट विस्तार से जुड़े क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए केवल रोजगार या परियोजना विस्तार ही मुद्दा नहीं है। ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल, प्रदूषण, आवागमन और बुनियादी सुविधाओं जैसे कई विषय लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं।

लेकिन जनसुनवाई में इन स्थानीय और मूलभूत समस्याओं पर व्यापक एवं प्रभावी चर्चा नहीं हो पाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि किसी भी खनन परियोजना के विस्तार का असर केवल जमीन तक सीमित नहीं रहता। इससे आसपास के गांवों की सड़क व्यवस्था, पर्यावरण, स्वास्थ्य, जलस्रोत, कृषि और आने वाली पीढ़ियों की जीवनशैली प्रभावित हो सकती है। ऐसे में जनसुनवाई केवल औपचारिक प्रक्रिया न होकर स्थानीय जनता के सवालों का मंच बननी चाहिए।

क्या प्रभावितों की वास्तविक राय दर्ज हुई?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब भारी बारिश के कारण प्रभावित ग्रामीणों का बड़ा वर्ग जनसुनवाई में पहुंच नहीं सका, तो उनकी आपत्तियों और सुझावों को किस आधार पर दर्ज किया गया?

क्या जनसुनवाई से पहले प्रभावित गांवों में पर्याप्त जानकारी पहुंचाई गई थी?
क्या ग्रामीणों को जनसुनवाई स्थल तक पहुंचने में किसी प्रकार की सुविधा उपलब्ध कराई गई?
क्या खराब सड़कों और बारिश के कारण प्रभावित लोगों की अनुपस्थिति को गंभीरता से लिया गया?
और सबसे महत्वपूर्ण — क्या जनसुनवाई में दर्ज राय वास्तव में प्रभावित क्षेत्र की व्यापक जनता की राय का प्रतिनिधित्व करती है?इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है।

SECL की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल-

परियोजना से जुड़े मुद्दों को लेकर अब SECL की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि केवल प्रक्रिया पूरी कर लेने से जनसुनवाई सार्थक नहीं हो जाती। वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी, जब प्रभावित क्षेत्र के अधिक से अधिक लोगों को अपनी बात रखने का अवसर मिले और उनके सवालों का स्पष्ट जवाब दिया जाए।

लोगों का आरोप है कि जमीनी स्तर पर जनता की पर्याप्त भागीदारी के अभाव के बावजूद प्रक्रिया को सफल बताने की कोशिश की जा रही है। हालांकि इन आरोपों पर SECL और संबंधित अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है।

जनता की आवाज सुने बिना विकास कैसा?

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास और रोजगार के विरोध में नहीं हैं, लेकिन किसी भी परियोजना का विस्तार जनहित, पर्यावरण संरक्षण और प्रभावित परिवारों के अधिकारों को ध्यान में रखकर होना चाहिए।

यदि परियोजना से क्षेत्र को लाभ मिलना है तो उसके साथ स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार, बेहतर सड़कें, शिक्षा व्यवस्था, पेयजल, प्रदूषण नियंत्रण और प्रभावित परिवारों के हितों की स्पष्ट व्यवस्था भी होनी चाहिए।

अब उठ रही है दोबारा जनसुनवाई की मांग-

भारी बारिश के कारण बड़ी संख्या में ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों के नहीं पहुंच पाने के बाद अब यह मांग उठ रही है कि प्रभावित क्षेत्र की जनता को पर्याप्त अवसर देने के लिए जनसुनवाई की प्रक्रिया पर पुनर्विचार किया जाए अथवा ऐसी व्यवस्था की जाए जिसमें बारिश और खराब आवागमन के कारण अनुपस्थित रहे प्रभावित लोग भी अपनी आपत्ति और सुझाव दर्ज करा सकें।

आमाडांड ओपन कास्ट विस्तार को लेकर अब प्रशासन और परियोजना प्रबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह यह सुनिश्चित करे कि विकास की प्रक्रिया में जनता की आवाज दबे नहीं, बल्कि सुनी जाए।

फिलहाल खाली पड़ी कुर्सियां सिर्फ एक तस्वीर नहीं, बल्कि कई सवाल खड़े कर रही हैं—क्या आमाडांड ओपन कास्ट विस्तार की जनसुनवाई में वास्तव में प्रभावित जनता की आवाज पहुंच पाई?
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