वैष्णव शर्मा विरचित समसामयिक "कर्तव्य हलाहल" शीर्षक अध्यात्मिक कविता:---
शिवजी हलाहल पीए थे,
समुद्र मंथन के बाद।
एक ही बार में पी गए थे,
बिष मिलने के बाद।
तब भी न अकुलाए थे,
उससे जलने के बाद।
नीलकंठ कहलाए थे,
बिषाक्त हो जाने के बाद।
लेकिन,
"वैष्णव"हलाहल पी रहे,
संसार सागर तैरने के बाद।
हरदम हलाहल पी रहे,
कर्तव्यनिष्ठ होने के बाद।
बिखरे जलजला समेट रहे,
निलम्बन न करने के बाद।
निर्दोषों को बचाते रहे,
बिषपान करने के बाद। - - 2
हस्तियां चिघ्घाडते रहे,
मदमदिरा पीने के बाद।
फक्कड"वैष्णव"अडिग रहे,
सुनामी आने के बाद।
नित्य हलाहल पी रहे,
धरती पर आने के बाद।
हस्तियां गर्त मे जाते रहे,
अशक्त होने के बाद।
काल के शिकार होते रहे,
हस्तियां मिटने के बाद।
सब"वैष्णव"इठलाते रहे.,
द्रष्टाभाव आने के बाद।
चतुर चातुरी समझाते रहे,
दुर्दशा देखने के बाद।
समझ मे तब क्या आएगा,
समय बीत जाने के बाद ? 2
समय बीत जाएगा,
समय बीत जाने के बाद।-- 2
